Posted by: malji | ડિસેમ્બર 6, 2008

श्री शनिचालीसा

श्री  शनिचालीसा

 

||दोहा||

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगळ करण क्रुपाल |

दीनन के दुख दुर करि, कीजै नाथ निहाल ||

जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज |

करहु क्रुपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज ||

 

जयति जयति शनिदेव दयाला |

करत सदा भकतन प्रतिपाला ||

 

चारि भुजा, तनु श्याम विराजै |

माथे रतन मुकुट छबि छाजै ||

 

परम विशाल मनोहर भाला |

टेढि द्रष्टि भ्रुकुटि विकराला ||

 

कुण्डल श्रवण चमाचम चमके |

हिये माल मुकतन मणि दमके ||

 

कर में गदा त्रिशुल कुठारा |

पल बिच करैं शत्रु संहारा ||

 

पिंगल, क्रुष्णो, छायानन्दन |

यम, कोण्स्थ, रौद्र, दुखभंजन ||

 

सौरी मंन्द, शनि, दश नामा |

भानु पुत्र पुरहिं सब कामा ||

 

जापर प्रभु प्रसन्न हो जाहीं |

राव करैं रंकहि क्षण माहीं ||

 

पर्वतहु तुण कोइ निहारत |

तुण हु को पर्वत सम करि डारत ||

 

राज मिलत बन रामहिं दीन्हो |

कैकेइ की मति हरि लीन्हो ||

 

बन में म्रुग कपट दिखाइ |

मात्रु जानकी गइ चुराइ ||

 

रावण की मति गइ बोराइ |

रामचन्द्र सों बैर बढाइ ||

 

दियो क्षारि करि कंचन लंका |

बाज्यो बजरंग बीर का डंका ||

 

लक्षमण विकल शकित के मारे |

रामादल चिंतित भयै सारे ||

 

न्रुप विक्रम पर दशा जो आइ |

चित्र मयुर हार गा खाइ ||

 

हार नोलखा की लगि चोरी |

हाथ पैर डरवायो तोरी ||

 

अति निन्दामय बीता जीवन |

तेली सेवा लायो न्रुप तन ||

 

विनय राग दिपक महं कीन्हो |

तब प्रसन्न प्रभु है सुख दिन्हो ||

 

हरीश चंद्र  न्रुप नारि बिकानि |

राजा भ्ररयो डोम घर पानि ||

 

वक्र द्रष्टि जब नल पर आइ |

भुंजी मीन जल पैठि जाइ ||

 

श्री शंकर हिं गह्यो जब जाइ |

जगजननी कह भस्म कराइ ||

 

तनिक विलोकत करि कुछ रीसा |

नभ उडि गयो गोरीसुत सिसा ||

 

पान्ड्व पर भै दशा तुम्हारी |

अपमानित भइ द्रोपदी नारी ||

 

कौरव कुल की गती मति हारी |

युध्ध महाभारत भयो भारी ||

 

रवि कहं मुख महं घरि तत्काला |

कुदि परयो सहसा पाताला ||

 

शेष देव तब विनती कीन्ही |

मुख बाहर रवि को कर दिन्ही ||

 

वाहन प्रभु के सात सुजाना |

दिग्गज, गद्र्भ, म्रुग, अरुस्वाना ||

 

जम्बुक, सिंह आदि नखधारी |

सो फल ज्योतिष कहत पुकारी ||

 

गज वाहन लक्ष्मी ग्रुह आवे |

हय ते सुख समप्ति उपजावें ||

 

गद्र्भ हानि करै बहु काजा |

सिंह सिद्द कर राज समाजा ||

 

जम्बुक बुद्दि नस्ट कर डारैं |

म्रुग दे कस्ट प्राण संहारे ||

 

जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी |

चोरी आदि होय डर भारी ||

 

तैसहि चारि चरण यह नामा |

स्वणे लोह चांदी अरु तामा ||

 

लोह चरण पर जब प्रभु आवैं |

धन जन सम्पति नष्ट करावै ||

 

समता ताम्र रजत शुभकारी |

स्वणे सदा शुम मंगल कारी ||

 

जो यह शनि चरित्र नित गावै |

द्शा निकुष्ट कबहु सतावै ||

 

नाथ दिखावे अदभुत लीला |

निबल करै जैहे बलशीला ||

 

जो पण्डित सुयोग्य बुलवाइ |

विधि वत शनि ग्रह शांति कराइ ||

 

पीपल जल शनि दिवस चढावत |

दीप दान दै बहु सुख पावत ||

 

कहतरामसुंदरप्रभु दासा |

शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा ||

 

 

||दोहा||

 

पाठ शनिश्वर देव को, कीन्होंविमलतैयार,

करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार ||

 

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